भगवद चिंतन,
किसी को देखकर नहीं अपितु किसी के लिए जलो। किसी को देखकर जलना वहाँ मनुष्य जीवन का पतन है वहीँ किसी के लिए जलना मनुष्य जीवन की उपलब्धि।
दीपक का जीवन इसलिए वन्दनीय नहीं हैं कि वह जलता है अपितु इसलिए वन्दनीय है कि वह दूसरों के लिए जलता है। वह स्वयं वेदना सहता है और दूसरों को प्रकाश ही बाँटता है। जीवन वही सार्थक है जो मिट्टी बनने से पहले दूसरों के लिए मिट जाए, नियति तो मिटटी बनना ही है।
ईर्ष्या और द्वेष में जलना बड़ी नासमझी है। ईर्ष्या और द्वेष वो आग है जिसे पानी से बुझाना सम्भव नहीं। यह आग तब तक शांत नहीं होती जब तक स्वयं उस ईर्ष्यालु मनुष्य को पूर्ण जलाकर भस्म न कर दे।
अगर हिम्मत हो तो अवश्य जलो मगर दीपक की तरह।
किसी को देखकर नहीं अपितु किसी के लिए जलो। किसी को देखकर जलना वहाँ मनुष्य जीवन का पतन है वहीँ किसी के लिए जलना मनुष्य जीवन की उपलब्धि।
दीपक का जीवन इसलिए वन्दनीय नहीं हैं कि वह जलता है अपितु इसलिए वन्दनीय है कि वह दूसरों के लिए जलता है। वह स्वयं वेदना सहता है और दूसरों को प्रकाश ही बाँटता है। जीवन वही सार्थक है जो मिट्टी बनने से पहले दूसरों के लिए मिट जाए, नियति तो मिटटी बनना ही है।
ईर्ष्या और द्वेष में जलना बड़ी नासमझी है। ईर्ष्या और द्वेष वो आग है जिसे पानी से बुझाना सम्भव नहीं। यह आग तब तक शांत नहीं होती जब तक स्वयं उस ईर्ष्यालु मनुष्य को पूर्ण जलाकर भस्म न कर दे।
अगर हिम्मत हो तो अवश्य जलो मगर दीपक की तरह।
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